जहाँ धरती की पूजा होती है, वहाँ पौधे भी प्रार्थना बन जाते हैं — मंगल ग्रह मंदिर में खिली संत श्री सखाराम महाराज रोपवाटिका
26 जून की पवित्र सायंकाल को मंगल ग्रह मंदिर, अमळनेर में नवनिर्मित संत श्री सखाराम महाराज रोपवाटिका को संत श्री प. पू. प्रसाद महाराज का सानिध्य मिला — जहाँ ईश्वर के प्रति आस्था और धरती के प्रति कृतज्ञता एक हो गई।

मिट्टी नहीं, माँ है वह
सनातन दर्शन में भूमि केवल मिट्टी नहीं है। वह भूमि माता है — जीवित, जागृत, सर्वपालिनी देवी। उसकी गोद में जो बीज गिरता है, वह प्रार्थना बन जाता है। उसके आँचल से जो वृक्ष उठता है, वह मंदिर बन जाता है।
और इसीलिए, जब किसी देवालय के आँगन में एक रोपवाटिका जन्म लेती है — तो वह केवल बगीचा नहीं रहती। वह एक जीवित अर्पण बन जाती है। एक ऐसी प्रार्थना, जो सांस लेती है और प्रतिदिन बढ़ती है।
शुक्रवार, 26 जून की सायंकाल — श्री मंगल ग्रह मंदिर, अमळनेर के पवित्र प्रांगण में कुछ ऐसा ही हुआ। नवविकसित संत श्री सखाराम महाराज रोपवाटिका में संत श्री सखाराम महाराज वाडी संस्थान के गादीपति प. पू. प्रसाद महाराज पधारे। उन्होंने फलक अनावरण किया, अपने आशीर्वाद से इस हरित तीर्थ को अभिसिंचित किया और मंगल ग्रह सेवा संस्था के इस हरित संकल्प को भरपूर शुभेच्छाएँ दीं।
बीस वर्षों की तपस्या — हर जड़ में छिपी है श्रद्धा
यह रोपवाटिका रातोंरात नहीं बनी।
मंगल ग्रह सेवा संस्था के अध्यक्ष डॉ. डिगंबर महाले के दूरदर्शी मार्गदर्शन में और ग्रीनरी कन्सल्टेंट श्री सुबोध पाटील के समर्पित परिश्रम से पिछले बीस वर्षों से यह रोपवाटिका प्रेम और अनुशासन से पाली जाती रही है।
यहाँ के हर पौधे में उन हाथों की स्मृति है जिन्होंने बिना किसी प्रतिफल की आशा के — केवल श्रद्धा से — इस धरती की सेवा की।
हाल ही में हुए व्यापक नवीनीकरण में रोपवाटिका को एक नया और गहरा स्वरूप मिला है। इसमें विशेष विभाग बनाए गए हैं:
गांडुल खत प्रकल्प — धरती ने जो दिया, उसे वापस लौटाना
गुलाब बाग — सौंदर्य को ईश्वर के चरणों में अर्पित करना
वृक्षारोपण क्षेत्र — आज बो रहे हैं वह, जिसकी छाँव में आने वाली पीढ़ियाँ प्रार्थना करेंगी
जैविक खत प्रणाली — प्रकृति के साथ, प्रकृति की भाषा में
प्लास्टिक क्रशिंग यूनिट — जिस माँ की हम पूजा करते हैं, उसे शुद्ध रखना
निसर्ग बैठक स्थल — एक शांत, हरा कोना, जहाँ थका हुआ मन रुकता है और ईश्वर के करीब आता है
जब एक संत पौधों के बीच चले
रोपवाटिका देखने से पहले, प. पू. प्रसाद महाराज ने श्री मंगल ग्रह मंदिर में जाकर श्री मंगल देव का दर्शन किया — मानो भूमि के स्वामी से स्वीकृति लेकर ही उनकी पावन भूमि पर कदम रखा हो।
संस्था के सचिव सुरेश बाविस्कर, सहसचिव दिलीप बहिरम और खजिनदार गिरीश कुलकर्णी ने पाद्यपूजन कर उनका भव्य स्वागत किया। पुरोहित शुभम वैष्णव, हेमंत गोसावी और पवन शर्मा ने पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई।
महाराजश्री ने रोपवाटिका के प्रत्येक विभाग को ध्यान से देखा। औषधीय पौधों से लेकर फूलों की बाग तक, पर्यावरण संवर्धन के हर प्रयास को ध्यान से समझा। उन्होंने संतोष और प्रसन्नता व्यक्त करते हुए यह विश्वास दिलाया कि ऐसे उपक्रम केवल मिट्टी में नहीं — समाज की चेतना में भी बीज बोते हैं। और ये बीज, एक दिन वटवृक्ष बनते हैं।
एक मंदिर जो सिखाता है — केवल लेना नहीं, देना भी
श्री मंगल ग्रह मंदिर, अमळनेर की पहचान केवल यह नहीं कि यह भारत के दुर्लभतम मंगल देव मंदिरों में से एक है। या कि यहाँ विश्व का प्रथम भूमि माता मंदिर विराजमान है।
इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है — यह मंदिर केवल आशीर्वाद लेना नहीं सिखाता। यह वापस देना सिखाता है।
पौधे लगाना। धरती की रक्षा करना। निःस्वार्थ सेवा करना।
संत श्री सखाराम महाराज रोपवाटिका उसी शिक्षा का जीवंत, साँस लेता विस्तार है।
यहाँ प्रकृति और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं। वे एक ही हैं।
दर्शन के लिए आइए। बाग में रुकिए। परिवर्तन का एक बीज लेकर जाइए।
आस्था का एक ही ठिकाना — मंगल ग्रह मंदिर अमळनेर जाना।
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